कल्पना कीजिए, एक ऐसी दुनिया जहां बाढ़ की तबाही हो रही है, किसान सूखे से जूझ रहे हैं, और गरीब देशों को बचाव के लिए पैसे नहीं मिल रहे। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट आ गई है जो उम्मीद जगाती है। सीओपी30 सम्मेलन से महज कुछ दिन पहले जारी ‘बाकू टू बेलेम रोडमैप’ में दुनिया को 2035 तक हर साल 1.3 ट्रिलियन डॉलर जलवायु वित्त जुटाने का प्लान बताया गया है। यह खबर न सिर्फ पर्यावरण प्रेमियों के लिए बल्कि हर आम आदमी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन हम सबकी जिंदगी छू रहा है।
बाकू टू बेलेम रोडमैप: जलवायु वित्त की नई दिशा
यह रिपोर्ट 5 नवंबर 2025 को जारी हुई, जब सीओपी29 के अध्यक्ष मुक्तार बाबायेव और सीओपी30 के अध्यक्ष आंद्रे कोर्रेया डो लैगो ने मिलकर इसे पेश किया। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, “यह रोडमैप दिखाता है कि एकजुट होकर हम 2035 तक विकासशील देशों के लिए 1.3 ट्रिलियन डॉलर सालाना जुटा सकते हैं।” रिपोर्ट का मकसद साफ है- अमीर देशों से सार्वजनिक वित्त को 300 बिलियन डॉलर सालाना तक बढ़ाना, और निजी निवेश को जोड़कर कुल रकम को दोगुना करना।
रिपोर्ट के मुख्य तथ्य और आंकड़े
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में जलवायु वित्त सिर्फ 100 बिलियन डॉलर के आसपास है, जो जरूरत से बहुत कम है। 2022-23 में 70 फीसदी सहायता कर्ज के रूप में दी गई, जबकि अनुदान की दर घट रही है। यूएनसीटीएडी की एक नई रिपोर्ट ने भी चेतावनी दी है कि वैश्विक वित्तीय सिस्टम में सुधार न हुआ तो यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। ब्राजील, जहां सीओपी30 हो रहा है, ने पहले ही 67.8 बिलियन डॉलर का सस्टेनेबल डेब्ट मार्केट तैयार कर लिया है। यह आंकड़े बताते हैं कि रास्ता मुश्किल लेकिन संभव है।
जलवायु वित्त की पृष्ठभूमि: सीओपी29 से सीओपी30 तक का सफर
जलवायु वित्त की बहस पुरानी है। 2015 के पेरिस समझौते में अमीर देशों ने 2020 से 100 बिलियन डॉलर सालाना देने का वादा किया था, लेकिन वह लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ। अक्टूबर 2025 में जारी ‘रनिंग ऑन एंप्टी’ रिपोर्ट ने अनुकूलन वित्त की कमी पर रोशनी डाली। सीओपी29, जो बाकू में नवंबर 2024 में हुआ, ने 2035 से 300 बिलियन डॉलर सार्वजनिक वित्त का नया लक्ष्य तय किया। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह भी कम है, क्योंकि 1.5 डिग्री तापमान सीमा बचाने के लिए कुल 2.4 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत है। सीओपी30, जो 10 से 21 नवंबर 2025 तक बेलेम में चल रहा है, इसी गैप को भरने का मौका है।
वैश्विक चुनौतियां और सुधार की मांग
रिपोर्ट में व्यापार नीतियों को जलवायु लक्ष्यों से जोड़ने पर जोर दिया गया है। यूएन क्लाइमेट चीफ साइमन स्टील ने कहा, “वित्त अब बहना चाहिए, वरना पेरिस समझौता बेकार हो जाएगा।” विकासशील देशों में 58 फीसदी वित्त कर्ज है, जो बोझ बढ़ाता है। वैटिकन ने भी कॉल किया है कि विदेशी कर्ज और पर्यावरणीय कर्ज के बीच लिंक को समझा जाए।
भारत और समाज पर प्रभाव: आम लोगों की जिंदगी कैसे बदलेगी?
भारत जैसे देशों के लिए यह रिपोर्ट वरदान है। यहां बाढ़, चक्रवात और सूखा लाखों लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, 2025 में जारी स्टेट ऑफ द क्लाइमेट अपडेट के मुताबिक, यह साल रिकॉर्ड गर्मी का दूसरा या तीसरा साल बनेगा। अगर 1.3 ट्रिलियन डॉलर आया तो किसानों को बेहतर सिंचाई, तटीय इलाकों में मजबूत दीवारें और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश संभव होगा। गरीब परिवारों पर असर पड़ेगा- कम बीमारियां, ज्यादा रोजगार। लेकिन अगर लक्ष्य चूका तो 2 डिग्री से ज्यादा तापमान बढ़ेगा, जो करोड़ों लोगों की आजीविका छीन लेगा। जनजातियों ने कॉल किया है कि प्रदूषकों से सीधे मुआवजा मिले, जैसा कांगो बेसिन में हो रहा है।
विशेषज्ञों की चिंता: न्याय की मांग
ओइल चेंज इंटरनेशनल की रिपोर्ट कहती है कि यह रोडमैप वादा तो करता है लेकिन अमीर सरकारों को कॉप30 में ठोस योजना लानी होगी। ब्राजील के राष्ट्रपति लुला दा सिल्वा ने कहा, “हम जंगलों को बचाने के लिए ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी लॉन्च कर रहे हैं।” भारत के लिए यह मौका है कि दक्षिण एशिया के दूत अरुणाभ घोष वैश्विक एकजुटता पर जोर दें।
निष्कर्ष: अगले कदम और उम्मीद की किरण
सीओपी30 जलवायु वित्त का टर्निंग पॉइंट है। नेताओं को रोडमैप को अमल में लाने के लिए कमिटमेंट साइन करना होगा- निजी सेक्टर को शामिल करना, कर्ज माफी की योजना और ट्रेड पॉलिसी में बदलाव। अगर ऐसा हुआ तो विकासशील देश न सिर्फ बचेंगे बल्कि हरे विकास की मिसाल बनेंगे। हम सबको जागरूक रहना होगा, क्योंकि जलवायु न्याय हर नागरिक का हक है। क्या कॉप30 इतिहास रचेगा? आने वाले दिन बताएंगे।
F&Q
1: जलवायु वित्त रिपोर्ट क्या है और यह कब जारी हुई?
यह रिपोर्ट ‘बाकू टू बेलेम रोडमैप’ के नाम से जानी जाती है। यह 5 नवंबर 2025 को सीओपी29 के अध्यक्ष मुक्तार बाबायेव और सीओपी30 के अध्यक्ष आंद्रे कोर्रेया डो लैगो द्वारा जारी की गई। इसका मुख्य फोकस 2035 तक विकासशील देशों के लिए हर साल 1.3 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त जुटाना है।
2: जलवायु वित्त का मतलब क्या है?
जलवायु वित्त वह पैसा है जो अमीर देश और संस्थाएं गरीब देशों को देते हैं ताकि वे जलवायु परिवर्तन से लड़ सकें। इसमें हरित ऊर्जा, बाढ़ से बचाव और जंगलों की रक्षा जैसे कामों के लिए फंडिंग शामिल है। पेरिस समझौते के तहत अमीर देशों ने 100 बिलियन डॉलर सालाना देने का वादा किया था, लेकिन वह पूरा नहीं हुआ।
3: रिपोर्ट में क्या मुख्य लक्ष्य बताए गए हैं?
रिपोर्ट कहती है कि 2035 तक 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने होंगे, जिसमें 300 बिलियन डॉलर सार्वजनिक फंड से आएंगे। निजी निवेश को बढ़ावा देकर बाकी रकम पूरी की जाएगी। वर्तमान में सिर्फ 100 बिलियन डॉलर उपलब्ध है, जो बहुत कम है।
4: भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?
भारत जैसे देशों को फायदा होगा। इससे किसानों को बेहतर सिंचाई, तटीय इलाकों में मजबूत सुरक्षा और सोलर एनर्जी में निवेश बढ़ेगा। 2025 में रिकॉर्ड गर्मी के बीच यह फंडिंग बाढ़ और सूखे से लाखों लोगों को बचाएगी। लेकिन अगर लक्ष्य न मिला तो आजीविका पर खतरा बढ़ेगा।
5: सीओपी30 में क्या होने वाला है?
सीओपी30 10 से 21 नवंबर 2025 तक ब्राजील के बेलेम में हो रहा है। यहां इस रोडमैप को अमल में लाने पर चर्चा होगी। ब्राजील के राष्ट्रपति लुला दा सिल्वा ने ‘ट्रॉपिकल फॉरेस्ट्स फॉरएवर फैसिलिटी’ लॉन्च करने का ऐलान किया है। उम्मीद है कि अमीर देश ठोस कमिटमेंट देंगे।
Disclaimer
यह article सिर्फ education और knowledge purpose के लिए है। इसमें लिखी गई जानकारी को investment advice न समझें। किसी भी तरह का निवेश करने से पहले अपने financial advisor से सलाह लें।